सैटेलाइट इन्टरनेट क्या होता है और सैटेलाइट इन्टरनेट कैसे काम करता है?

नमस्कार दोस्तों आज हम “सैटेलाइट इन्टरनेट क्या होता है और सैटेलाइट इन्टरनेट कैसे काम करता है” इसके बारे में जानेंगे. ये तो आपको पता होगा ही इन्टरनेट क्या होता है? और इन्टरनेट के कितने टाइप्स होते है. इन्टरनेट के प्रकारों में से एक सैटेलाइट इन्टरनेट भी है. आज बिना इन्टरनेट के किसी भी देश की ग्रोथ रुक सकती है. और जहा इन्टरनेट नहीं है वो देश तो दुनिया से कटा हुआ ही है. साउथ कोरिया के 96 % लोग ऑनलाइन रहते है जबकि अफ़्रीकी देश सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक के केवल 5 % लोग ऑनलाइन रहते है. इस तरह दुनिया के पिछड़े देशों में इन्टरनेट पहुँचाने के लिए सैटेलाइट इन्टरनेट एक वरदान साबित हो सकता है.

दुनिया के 64.7 % लोग इन्टरनेट यूज करते है जबकि बाकि 35 % लोगो के पास इन्टरनेट की पहुच नहीं है. उसमे सबसे ज्यादा अफ़्रीकी देशो में केवल 46 % लोग इन्टरनेट यूज करते है. और ऐसा इसलिए है कि उनके पास इन्टरनेट की उपलब्धता नहीं है. और आपको भी पता होगा कि अफ्रीका के कुछ  प्रमुख देशो को छोड़कर बाकि देश बहुत पिछड़े है.

यहा पर पहले मै आपको कुछ टेक्निकल शब्दों के बारे में बता दू जो सैटेलाइट इन्टरनेट से सम्बंधित है जिससे आपको इस पोस्ट को अच्छे से समझने में आसानी होगी. और ये भी बता दू कि पूरी दुनिया में 99 % इन्टरनेट ऑप्टिकल फाइबर केबल द्वारा फैला हुआ है जबकि केवल 1% सैटेलाइट इन्टरनेट यूज होता है.

सैटेलाइट इन्टरनेट से जुडी कुछ तकनीकी जानकारी 

1. Orbit (कक्षा)- यह किसी भी ग्रह, उपग्रह और आकाशीय पिंड का परिक्रमा पथ होता है. ये गोलाकार, अंडाकार या पैराबोला के आकार का होता है. इसी पथ में सैटेलाइट घूमते है.

2. सैटेलाइट- सैटेलाइट को हिंदी में उपग्रह कहते है. उपग्रह वो होते है जो ग्रह का चक्कर लगाते है. जैसे चन्द्रमा एक प्राकृतिक उपग्रह है. और पृथ्वी ग्रह का चक्कर लगाता है. इसी तरह सैटेलाइट कृत्रिम उपग्रह है जो पृथ्वी का चक्कर लगाते है.

3. भू-स्थैतिक कक्षा (Geo-Stationary Orbit-GEO)- यह ऑर्बिट पृथ्वी सतह से 35,786 किमी. की उचाई पर स्थित है. इसी कक्षा में सैटेलाइट को स्थापित किया जाता है. सैटेलाइट उतने ही समय में पृथ्वी का एक चक्कर लगाते है जितने समय में पृथ्वी अपने अक्ष पर एक चक्कर पूरा करती है. इसीलिये ये पृथ्वी से देखने पर स्थिर दिखाई देते है. अधिक ऊंचाई के कारण यहा सैटेलाइट पृथ्वी के 33 % हिस्से को कवर कर सकता है. अधिक ऊंचाई के कारण ही यहा के सैटेलाइट की लेटेंसी 500 ms या 0.5 सेकंड होती है. जो कि इन्टरनेट के लिए अच्छा नहीं है. खासतौर से ऑनलाइन गेमिंग के लिए.

4. Low Earth Orbit-LEO GEO की लेटेंसी प्रॉब्लम से बचने के लिए LEO में सैटेलाइटस को रखना होगा. यह पृथ्वी के सतह से ऊपर 200 किमी. से 2,000 किमी. तक है. स्पेसएक्स की स्टार लिंक इन्टरनेट परियोजना में सैटेलाइटस को इसी ऑर्बिट में स्थापित किया जायेगा. जिससे दूरी कम होगी और डाटा को कम दूरी की यात्रा करने के कारण लेटेंसी 20-30 मिली सेकंड हो जाएगी. जो कि अच्छी बात है. लेकिन यहा पर ध्यान देने वाली बात ये है कि कम ऊंचाई के कारण हमें पृथ्वी को पूरा कवर करने के लिए बहुत ज्यादा सैटेलाइट12000 से भी ज्यादा की जरुरत पड़ेगी.

5. लेटेंसी क्या होता है (What is latency)- जब भी आप ब्राउज़र में कोई वेबसाइट का एड्रेस टाइप करके इंटर करते है तो उस वेबसाइट के खुलने और आपके इंटर करने के बीच का समय ही लेटेंसी होता है. इसे आप Delay भी कह सकते है. और इस delay का कारण नेटवर्क उपकरण जैसे राऊटर, कनेक्शन (ऑप्टिकल फाइबर या सैटेलाइट), सर्वर की लोकेशन पर निर्भर करता है. लेटेंसी को मिली सेकंड(ms) में मापते है. लेटेंसी को चेक करने के लिए पिंग टेस्ट किया जाता है जिसे आप भी कंप्यूटर में कर सकते है.

हाई लेटेंसी ख़राब इन्टरनेट को दर्शाती है जबकि कम (Low) लेटेंसी हाई स्पीड इन्टरनेट की पहचान है. हाई लेटेंसी के कारण ही Lag पैदा होता है. आपने देखा होगा ऑनलाइन गेम खेलते हुए Lag को महसूस किया होगा. लेटेंसी जितनी कम होगी उतना ही अच्छा है. ऑनलाइन गेमिंग के लिए लेटेंसी 20 – 40 ms हो तो बहुत अच्छा है.

लेटेंसी को आप, यूजर के एक्शन और वेबसाइट या ऐप के रिस्पांस के बीच का समय अंतराल भी कह सकते है.जैसे मान लीजिये आप मोबाइल या कंप्यूटर में शूटिंग गेम खेल रहे है. अब आपके सामने टारगेट आया और आपने गोली चलायी लेकिन ज्यादा लेटेंसी के कारण आपकी गोली टारगेट को लगने से पहले ही आपका टारगेट भाग गया.

सैटेलाइट इन्टरनेट क्या होता है ?

सैटेलाइट इन्टरनेट को आसान भाषा में बताता हूँ. सैटेलाइट इन्टरनेट में इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर अन्तरिक्ष में स्थित सैटेलाइट के द्वारा आपके घर पर लगे छोटे सैटेलाइट डिश को इन्टरनेट सेवा देता है. ठीक उसी तरह जैसे घर पर लगे डिश टीवी ऐन्टेना काम करता है.

सैटेलाइट इन्टरनेट को स्पेस इन्टरनेट भी कहते है. सैटेलाइट इन्टरनेट में पृथ्वी पर एक तरफ छोटी सैटेलाइट डिश होती है जो पृथ्वी के भू-स्थैतिक कक्षा में घूमने वाले सैटेलाइट को डाटा भेजती है और उससे डाटा रिसीव करती है. जबकि दूसरी तरफ कक्षा में मौजूद सैटेलाइट पृथ्वी पर Network Operations Center के द्वारा इन्टरनेट से मांगी गयी लेकर उसी रास्ते से छोटी सैटेलाइट डिश को दे देता है.

सैटेलाइट इन्टरनेट का इतिहास 

पृथ्वी की कक्षा में satellite छोड़े जाने की शुरुआत 1957 में सोवियत यूनियन (आज के समय का रूस) के sputnik से हुई थी. रूस के इस कदम से दुनिया के सारे वैज्ञानिको के होश उड़ गए थे. इसी कदम ने दुनिया के सबसे सबसे शक्तिशाली देशों के बीच स्पेस रेस की शुरुआत की. बाद 1958 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपना पहला satellite explorer 1 छोड़ा था.

वर्ष 1962 में USA की Bell Labs ने Telstar लांच किया जिसने पहली बार सैटेलाइट टेलीविज़न ब्रौडकास्ट की शुरुआत की. 1964 में नासा ने पहला Geo-Stationary Satellite छोड़ा जिसका नाम था Syncom 3. 1967 में रूस ने और 1972 में कनाडा ने भी सैटेलाइट टेलीविज़न भी शुरू कर दिया.

1976 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर Taylor Howard ने एक एक सैटेलाइट डिश और रिसीवर बनाया जो आराम से घर पर इनस्टॉल हो जाता था. ये डिश अमेरिकी और रुसी सैटेलाइट के सिग्नल को पकड़ लेता था.

1993 में USA की Hughes Aircraft Company ने सैटेलाइट इन्टरनेट के लाइसेंस के लिए अप्लाई किया था और वर्ष 2005 में सैटेलाइट इन्टरनेट सेवा देने के लिए Spaceway नाम का सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में छोड़ा. इसके बाद से और भी कंपनिया सैटेलाइट इन्टरनेट की सेवा देने लगी. इस समय सैटेलाइट इन्टरनेट सेवा देने वाली कंपनिया केवल USA और ब्रिटेन में है. जैसे-ViaSat, Echostar, Starlink, HugesNet, Bigblu. समय के साथ इन कंपनियों ने कैपेसिटी और बैंड विड्थ बढाकर इन्टरनेट सेवा को और भी तेज कर दिया.

सैटेलाइट इन्टरनेट का अविष्कार किसने किया?

इन्टरनेट पर आपको सैटेलाइट इन्टरनेट के आविष्कारक के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलेगी. यहा पर किसी एक इन्सान को सैटेलाइट इन्टरनेट शुरू करने के श्रेय नहीं दे सकते है. सैटेलाइट इन्टरनेट शुरू करने के लिए USA की Hughes Aircraft Company का नाम लिया जाता है.

सैटेलाइट इन्टरनेट के भाग (Satellite internet components) 

Dish- ये भी आपके टीवी डिश एंटीना के तरह होता है. जिसे आपके घर के पास एक सही पोजीशन में लगाया जाता है. ताकि ये सैटेलाइट को सिग्नल केन्द्रित करके भेज सके और सैटेलाइट से रिसीव कर सके.

Modem- Dish जो भी सिग्नल रिसीव करेगा वो मॉडेम को देता है. मॉडेम ही आपके राऊटर को इन्टरनेट से जोड़ता है. याद रखिये मॉडेम और राऊटर में अंतर होता है- मॉडेम आपको सीधे इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर से कनेक्ट करता है जबकि राऊटर, मॉडेम से इन्टरनेट लेकर आपको वाई फाई के द्वारा अनेक डिवाइस को इन्टरनेट बाँट कर देता है.

Network Operations Center (NOC)- ये सारे सैटेलाइट इन्टरनेट के कम्युनिकेशन लिंक को कण्ट्रोल करता है. ये किसी भी तरह की समस्या जैसे पावर समस्या, सिग्नल की समस्या पर नजर रखती है. ये वर्ष में हर समय चालू रहते है.

Ground Station- ये ठीक टेलीफोन एक्सचेंज के तरह काम करता है. ये सैटेलाइट से आपका सिग्नल लेकर मुख्य इन्टरनेट को देता है और मुख्य इन्टरनेट से आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी सैटेलाइट को दे देता है. आसान भाषा में कहे तो डाटा सिग्नल आ आदान प्रदान (एक्सचेंज) करता है.

सैटेलाइट इन्टरनेट कैसे काम करता है- How satellite internet works

सैटेलाइट इन्टरनेट क्या होता है

सैटेलाइट इन्टरनेट कैसे काम करता है ये जानने से पहले ये जान लेते है कि ब्रॉड बैंड इन्टरनेट या केबल इन्टरनेट कैसे काम करता है. टेलीफोन एक्सचेंज या कोई इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क द्वारा इन्टरनेट से जुड़े होते है. मान लेते है आपने बीएसएनएल एक्सचेंज से बीएसएनएल का ब्रॉड बैंड कनेक्शन लिया है. तो एक्सचेंज से केबल आपके घर के मॉडेम में कनेक्ट होगा जो बाद में वाई फाई या केबल द्वारा लैपटॉप में इन्टरनेट देगा.

इसी तरह आप सैटेलाइट इन्टरनेट में भी इन्टरनेट से जुड़े होते है. यहा पर अंतर ये होता है कि सैटेलाइट बिना किसी केबल के (वायरलेस) सिग्नल को भेजकर आपको मुख्य इन्टरनेट से जोड़ता है. यहा पर केबल आपके घर के पास रखे डिश से कनेक्ट होता है. यही डिश एंटीना स्पेस में सैटेलाइट को सिग्नल भेजता है और रिसीव करके आपको देता है. इसे अब उदाहरण से समझते है.

आपने ब्राउज़र ओपन करके वेब एड्रेस टाइप करके इंटर किया. आपके इंटर करने के बाद कंप्यूटर से सिग्नल आपके घर में लगे मॉडेम में गया और फिर आपके डिश एंटीना में गया. ये डिश एंटीना आपके सिग्नल को रेडियो सिग्नल में बदलकर 186,000 miles per second की स्पीड से पृथ्वी के कक्षा में मौजूद सैटेलाइट को भेज देगा. अब ये सैटेलाइट पृथ्वी पर मौजूद नेटवर्क ऑपरेशन सेंटर को सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशन के द्वारा को उसी स्पीड से भेजता है.नेटवर्क ऑपरेशन सेंटर(NOC) ऑप्टिकल फाइबर इन्टरनेट से जुड़ा होता है. इसी तरह NOC आपके द्वारा मांगी गयी वेबसाइट की जानकारी को इन्टरनेट से लेकर सैटेलाइट को वापस भेजता है और फिर सैटेलाइट आपके घर पर लगे डिश एंटीना के द्वारा मॉडेम को सिग्नल भेज देता है और वेबसाइट ओपन हो जाती है. ये चक्र इसी तरह चलता है और आप इन्टरनेट से जुड़े रहते है. ये सारी प्रक्रिया 1 सेकंड से भी कम समय में हो जाती है.

सैटेलाइट इन्टरनेट कहा पर उपलब्ध है?

इस समय सैटेलाइट इन्टरनेट केवल संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम (इंग्लैंड+वेल्स+स्कॉटलैंड+उत्तरी आयरलैंड) में है. एलोन मस्क ने भी भारत सहित कुछ देशो में स्टारलिंक सैटेलाइट इन्टरनेट सेवा शुरू करने की घोषणा की है. Hughes India कंपनी ने भारत के उत्तर पूर्वी इलाके जैसे लद्दाख, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश में सैटेलाइट इन्टरनेट देने के लिए इसरो के साथ समझौता किया है. इस तरह इसकी मांग आने वाले समय में रिमोट या दुर्गम क्षेत्रों में बढ़ने वाली है.

सैटेलाइट इन्टरनेट के लाभ

  • Global Coverage- सैटेलाइट इन्टरनेट की सबसे अच्छी बात ये है कि ये एक पूरे महाद्वीप को कवर कर सकता है. कोई भी लोकेशन हो जैसे पहाड़ी या पठारी या मैदानी क्षेत्र ये सबको कवर करता है.
  • आज के समय में 99 % इन्टरनेट ऑप्टिकल फाइबर केबल द्वारा दिया जाता है. ये केबल मोबाइल टावरों से जुड़कर आपको इन्टरनेट देते है. इन केबलो और टावरों को उबड़ खाबड़ और पहाड़ी क्षेत्रो में बिछाना कठिन होता है. इसलिए इन क्षेत्रों में केबलो का अच्छा विकल्प सैटेलाइट इन्टरनेट हो सकता है.
  • High-speed internet- जहा पर dial-up इन्टरनेट है या इन्टरनेट के कम विकल्प है वहा पर ये अच्छा विकल्प होता है. और हाई स्पीड इन्टरनेट देता है. Dial-up इन्टरनेट के तुलना में इनकी स्पीड बहुत ज्यादा होती है.
  • सैटेलाइट इन्टरनेट हाई बैंड विड्थ को हैंडल कर सकता है. इसका मतलब ये हुआ कि पीक समय पर बहुत ज्यादा यूजर होने पर आपके इन्टरनेट स्पीड पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.
  • सैटेलाइट इन्टरनेट के लिए किसी तरह की फोन लाइन की जरुरत नहीं पड़ती है.

सैटेलाइट इन्टरनेट के नुकसान 

  • ख़राब मौसम जैसे तेज आंधी या बारिश सैटेलाइट इन्टरनेट को प्रभावित कर सकती है.
  • इसमे आपको डाटा को अन्तरिक्ष में भेजना फिर ISP को भेजना और फिर ISP से स्पेस और स्पेस से आपके पास भेजना. जिससे डाटा को ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती है. इससे Delay या लैग पैदा होता है जो लेटेंसी के ज्यादा होने के लिए उत्तरदायी है. ये ऑनलाइन गेमिंग के अच्छा नहीं है.
  • आपके डिश को हमेशा दक्षिण दिशा में लगाना होता है. किसी भी तरह की रुकावट जैसे पेड़ या बिल्डिंग सिग्नल को रोक सकते है.
  • ये अन्य इन्टरनेट कनेक्शन के अपेक्षा महंगे होते है.
  • अन्तरिक्ष में हर वर्ष सैटेलाइट की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे वहा पर Space junk (अन्तरिक्ष कचरा) बढ़ रहा है. Space junk के बढ़ने का कारण सैटेलाइटस का एक दूसरे से टकराना भी है.
  • सैटेलाइट इन्टरनेट कंपनी शुरू करने का शुरूआती खर्च ज्यादा होता है.

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दोस्तों मुझे पूरा यकीं है आपको “सैटेलाइट इन्टरनेट क्या होता है और सैटेलाइट इन्टरनेट कैसे काम करता है” हिंदी में अच्छे से समझ आ गया होगा और इससे सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो आप कमेंट करके पूछ सकते है आपके प्रश्नों का जवाब देने में मुझे खुशी होगी. दोस्तों अगर ये टॉपिक आपको ज्यादा टेक्निकल लग रहा है तो कोई बात नहीं दिमाग के लिए इस तरह की जानकारी फायदेमंद होती है जो आपके सोच को और विस्तार देती है. 

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Sunil Kumar Singh

नमस्कार दोस्तों मै सुनील कुमार सिंह, utsukHindi का technical author हूँ। मै मिर्ज़ापुर (U.P) के एक गाँव का रहने वाला हूँ। मै एक Engineering graduate हूँ। इसलिए मुझे technical और internet से सम्बंधित नयी विषयो को पढना अच्छा लगता है।

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